
अगली सुबह … सूरज की सुबह की सुहानी किनरे कमरे के रोशनदानी से छानकर बिस्तर पर पड़ी,, हल्के हिलते पर्दे से और बालकनी के आधे खुले दरवाजा से हल्की ठंडी हवा कमरे मे घुस रही थी, जमीन पर पारो का ब्लाउज लावारिस की तरह छोड़ दिया गया था, जबकि बिस्तर पर जो जान की शरीर एक दूसरे से उलझें हुए, खुद मे सटाए सो रहे थे …
पारो की आँखों पर जब सीधी रोशनी पड़ी तो उसके पलकें जोर से भींच गए, उसके एक हाथ उठ कर आँखों को ढकने लगे …वो थोड़ा हिलते हुए अपने पीछे से आते गर्माहट में रगड़ी ताकि और गर्माहट मिल जाए,, अर्जुन का मजबूत चौड़ा सीना उसके पीठ से सटा हुआ था,,उसका मुंह उसके बालों में घुसे हुए गर्दन के सतह को छू रहे थे,, उसका बड़ा हथेली हमेशा के जैसे उसके एक स्तन को दबोचे हुए, थोड़े दबाव से, जैसे उन्हें नींद मे भी मसलाना नहीं भुला,,



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